आकाश खरबंदा दिव्य रणभूमि ब्यूरो
नई दिल्ली /चंडीगढ़ । आम आदमी पार्टी के भीतर एक बार फिर आंतरिक लोकतंत्र को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल की ‘डिक्टेटरशिप’ कार्यशैली को लेकर विरोध के स्वर समय-समय पर उठते रहे हैं। और अब यह बहस फिर तेज हो गई है। पार्टी के शुरुआती दौर में कई बड़े चेहरों ने संगठन को मजबूत किया। केजरीवाल के वनमैन बर्ताव के चलते मतभेदों के चलते अलग हो गए। इनमें प्रमुख रूप से प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव , कुमार विश्वास व पत्रकार आशुतोष शामिल हैं। इन नेताओं ने खुलकर आरोप लगाए थे कि पार्टी में निर्णय लेने की प्रक्रिया केन्द्रीकृत होती जा रही है। इसके अलावा पंजाब से सांसद धर्मवीर गांधी, पंजबा विधानसभा में नेता विपक्ष रहे एच.एस. फुल्का व विधायक सुखपाल सिंह खैहरा, पंजाब में आप के अध्यक्ष रहे गुरप्रीत घुग्गी व सुच्चा सिंह छोटेपुर सरीखे नेताओं का पार्टी से अलग होना भी इसी कड़ी में देखा जाता है। पंजाब पुलिस के पूर्व आईजी व आप के अमृतसर से विधायक कुंवर विजय प्रताप का पार्टी से संस्पैंशन व उनकी तरफ से पार्टी नेतृत्व पर हमले भी राजनितिक क्षेत्रों में किसी से छुपे हुए नहीं हैं। हाल के दिनों में राघव चड्डा को राज्यसभा के डिप्टी लीडर पद से हटाना पार्टी के भीतर के भविष्य में उठने वाले तूफान का संकेत है। आम आदमी पार्टी की गतिविधियो पर नजर रखने वाले राजनीतिक विश्लेष्कों का मानना है कि किसी भी तेजी से बढ़ती पार्टी में विचारों का टकराव स्वाभाविक है, लेकिन आप के मामले में कई वरिष्ठ नेताओं का बाहर जाना संगठनात्मक शैली पर सवाल खड़े करता है। विपक्षी दल इसे आप सुप्रीमों की डिक्टेटरशिप करार देते हैं, जबकि पार्टी नेतृत्व इन आरोपों को खारिज करते हुए इसे अनुशासन बनाए रखने की जरूरत बताता है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में पार्टी इन चुनौतियों से कैसे निपटती है और क्या आंतरिक मतभेदों को सुलझा पाती है या नहीं।
